सजते दीपक फिर क्या कहते, जब नीर बहुत हो आँखों में,
कैसे उजियारा टिक पाता, डूबे हुए उन पलक़ों में।
सपनों के इस डेरे में मैं, उम्र का मौसम भूल गया,
सोना था कुछ पल चैन से लेकिन, ख़्वाबों में ही झूल गया।
रात बिछाती रही सितारे, चाँद कहानी कहता था,
मैं यादों की चादर ओढ़े, अपना ही दुःख सहता था।
जब नींद खुली तो सचमुच में, तकिया भी भीगा पाया था,
जो सपना अपना लगता था, वह वक़्त का ही साया था।
संगीत बहुत सुन चुका तभी तो, स्वर की पीड़ा जान सका,
हर इक तान के पीछे छिपा, मौन का आँसू पहचान सका।
बाँसुरी मीठी क्यों लगती है, उसने सीने में छेद सहे,
वीणा के तारों ने भी पहले, कितने मौन प्रहार सहे।
नीरस में इतना रस भर दे, शब्द स्वयं झरने बन जाएँ,
सूखी धरती के होठों पर, सावन के अक्षर उग आएँ।
आँखों से जब दरिया बहता, केवल पानी बहता नहीं,
बरसों से चुप बैठा हुआ, मन भी फिर चुप रहता नहीं।
जिसने पीड़ा को गा डाला, वही अमर हो पाया है,
जिसने आँसू पीकर हँसा, वही दीप बन छाया है।
मत पूछो कितनी रातें थीं, जिनमें नींद नहीं आई थी,
हर करवट पर एक कहानी, चुपके-चुपके गाई थी।
अब जो लिखता हूँ काग़ज़ पर, वह केवल अल्फ़ाज़ नहीं,
ये धड़कन की वह दस्तक है, जिसमें कोई राज़ नहीं।
इतनी कृपा ऐ जीवन देना, भाव कभी कमतर न रहें,
नीरस मन में रस ऐसा हो, सूखे वृक्ष भी हरियाते रहें।
और अगर बहना ही ठहरे, आँखों का यह पावन नीर,
तो इतना बहना ऐ मालिक…
दर्द धुले, मन हो गंभीर।
सजते दीपक फिर मुस्काएँ,
जब आशा का उत्सव हो।
आँखों से दरिया तब ही बहे,
जब हर आँसू भी कोई तीर्थ हो।
-रतन कुमार कैथवास
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