तुम मुझे बताकर जा रहे हो,
तुम असल में,
मेरे पास से जाना ही नहीं चाहते हो।
जो लोग सचमुच चले जाना चाहते हैं,
वो अक्सर,
दरवाज़े की आवाज़ भी नहीं होने देते।
मैंने तुम्हारी आँखों में देखा,
वहाँ विदाई कम थी,
इजाज़त ज़्यादा थी।
तुम बार-बार कह रहे थे…
"अब चलता हूँ..."
और हर बार,
एक नया बहाना ढूँढ़ लेते थे,
कभी घड़ी देख लेते,
कभी मौसम,
कभी चाय का आख़िरी घूँट।
मैं मुस्कुरा रहा था,
क्योंकि मैं समझ चुका था…
तुम्हारे क़दम बाहर की तरफ़ थे,
मगर दिल अब भी,
इसी कमरे में बैठा था।
दरवाज़े तक पहुँचकर,
तुमने एक बार फिर मुड़कर पूछा…
"कुछ कहना तो नहीं था?"
मैंने कहा…
"अगर होता,
तो तुम्हें रोक लेता।"
तुमने भी धीमे से कहा…
"अगर सच में जाना होता,
तो पूछता ही क्यों?"
उस एक वाक्य ने,
पूरी शाम का अर्थ बदल दिया।
तब समझ आया,
कुछ लोग अलविदा इसलिए नहीं कहते,
कि रिश्ता ख़त्म हो रहा है।
वो इसलिए बताते हैं,
कि सामने वाला,
एक बार कह दे…
"थोड़ी देर और रुक जाओ।"
और कई बार,
मोहब्बत का सबसे सच्चा इज़हार
"मैं तुमसे प्यार करता हूँ" नहीं होता।
वो बस इतना होता है…
"मैं जा रहा हूँ..."
और मन ही मन यह उम्मीद करना,
कि सामने वाला मुस्कुराकर कहे…
"इतनी भी क्या जल्दी है... अभी बैठो,
कुछ बातें और बाकी हैं।"
-रतन कुमार कैथवास
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