छोटी-छोटी खुशियाँ ही चाहिए,
सबका यही अरमान रहता है,
टाइम पर घर आ जाएँ,
फ़ैमिली के साथ मिलकर
गप्पें मारते हुए चाय पी जाएँ।
रोज़ की भागदौड़ से लौटकर,
बस इतना-सा आराम रहता है,
कोई पूछ ले "दिन कैसा था?",
यही सबसे बड़ा इनाम रहता है।
रोटी चाहे सादी ही क्यों न हो,
साथ में अपनापन परोस दिया जाए,
हँसी की दो-चार चुटकियाँ हों,
फिर हर निवाला स्वाद बन जाए।
बच्चों की शरारत सुनते-सुनते,
थकान कहीं खो जाती है,
माँ की डाँट भी उस पल,
दुआओँ जैसी लग जाती है।
पापा दिनभर की बातें करें,
माँ हँसकर बीच में टोक दिया करे,
भाई-बहन पुरानी यादों पर,
बिना वजह ही ठहाके लगा दिया करें।
ना बड़ी गाड़ी की चाह रहे,
ना महलों का अरमान रहे,
जिस घर में सुकून मुस्कुराता हो,
वही सबसे बड़ा जहान रहे।
कुछ पल मोबाइल से दूर रहें,
कुछ रिश्तों को भी वक्त दिया जाए,
जो दिल के सबसे पास खड़े हैं,
उन्हें भी दिल से गले लगाया जाए।
ज़िंदगी आखिर क्या माँगती है,
दो मीठे लफ़्ज़, थोड़ा सम्मान रहता है,
छोटी-छोटी खुशियाँ ही चाहिए,
बस इतना-सा इंसान का अरमान रहता है।
-रतन कुमार कैथवास
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