स्वर्ग ऐसा नहीं कि, वहाँ भी हिसाबों में ज़िंदगी कट जाए,
मेहनत का हर कतरा, फिर तनख़्वाहों में बँट जाए,
रोटी सस्ती हो, मगर इंसान महँगा बिकने लगे,
और चैन की हर साँस, किसी फ़रमान में सिमट जाए।
व्यवस्था ऐसी नहीं कि, न्याय भी अनुमति माँगता रहे,
हुक्मरान सोते रहें, और आदमी जागता रहे,
क़ानून ऐसा नहीं कि, ताक़तवर के आगे झुक जाए,
और कमज़ोर हर बार, अपने हिस्से का सच छुपाता रहे।
नगर ऐसा नहीं कि, चौराहे तो रोशनियों से भर जाएँ,
मगर दिलों के रास्ते, अँधेरों में खो जाएँ,
दीवारें ऐसी नहीं कि, इंसानों को बाँटती रहें,
और पुल बनें तो, सिर्फ़ नक़्शों में नज़र आएँ।
ईश्वर ऐसा नहीं कि, दर्शन के लिए शर्तें लगाता रहे,
पवित्रता का प्रमाण माँगे, इंसान ठुकराता रहे,
प्रार्थना ऐसी नहीं कि, होंठों तक ही ठहर जाए,
और धर्म ऐसा नहीं कि, आदमी से आदमी को दूर कर जाए।
कारख़ाने ऐसे नहीं कि, साँसों को धुआँ बना दें,
कामगार ऐसे नहीं कि, अपने सपनों को सज़ा बना लें,
रविवार की छुट्टी में भी, चैन अगर नसीब न हो,
तो कैसी तरक़्क़ी, जो इंसान को ही मशीन बना दे?
स्वर्ग ऐसा हो कि, धरती को भी उस पर नाज़ हो,
हर हाथ को काम, हर पेट को रोटी का आग़ाज़ हो,
न कोई ख़ुदा के नाम पर, इंसानियत से दूर हो,
न कोई इंसान अपने ही, वजूद से मजबूर हो,
और मुक्ति ऐसी हो कि, जीते-जी जीवन का एहसास हो।
-रतन कुमार कैथवास
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