इस कदर मासूम है वो,
जैसे बैटरी से चलता हुआ रोबोट है,
न दुनिया की चालाकी समझता है,
न उसे किसी फ़रेब का खौफ़ है।
चेहरे पर भोली-सी मुस्कान लिए,
हर किसी को अपना मानता है,
लोग मतलब लेकर लौट जाते हैं,
वो फिर भी रिश्तों को पहचानता है।
उसे क्या ख़बर इस बाज़ार की,
जहाँ हर चेहरा कोई सौदा है,
वो दिल लेकर घूमता है हाथों में,
उसे लगता है हर इंसान सच्चा है।
कोई उसकी मासूमियत को कमजोरी न समझे,
ये भूल बहुत महँगी पड़ती है,
रोबोट सही, मगर दिल तो अपना है…
बैटरी खत्म हो जाए, लेकिन मोहब्बत नहीं मरती है।
इस कदर मासूम है वो,
जैसे दुनिया से बेख़बर कोई ख़्वाब है,
जिसे चालाकियाँ समझ नहीं आतीं…
शायद इसलिए आज भी इतना लाजवाब है।
-रतन कुमार कैथवास
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