हर शहर के तेवर अलग हैं, खुशबू भी शायद अलग है,
गलियों की अपनी धड़कन है, हर मोड़ का अंदाज़ अलग है।
शूल-सी चुभती हरियाली भी जाने क्यों अपनी लगती,
मन के कोने में छिपा हुआ कोई पुराना एहसास अलग है।
तुम्हारे शहर की शामों में जाने कैसी बात बसी है,
ढलते सूरज की किरणों में जैसे कोई याद हँसी है।
हवा चले तो लगता है तुमने मेरा नाम पुकारा,
इस अनजानी-सी ख़ुशबू में भी उसकी एक मिठास बसी है।
कहते हैं शहर पत्थर के हैं, दिल कहाँ किसी का होता है,
फिर क्यों तुम्हारी गलियों का हर रास्ता अपना-सा लगता है।
जिस मोड़ से गुज़रूँ लगता है तुम यहीं कहीं मिल जाओगे,
शायद प्रेम का यही असर है, दूर रहो तो पास-सा होता है।
मन के कोने में दबा हुआ कुछ कहने को तैयार है,
आँखों में ठहरा एक सपना अब भी बेक़रार है।
बहाने चाहे लाख बनाऊँ, सच तो बस इतना ही है…
हमको बुलाता तुम्हारा शहर, हमें तुम्हारा इंतज़ार है।
अब कौन बताए दिल को कि लौट जाना आसान नहीं,
जिस शहर में तुम बसते हो, उससे कोई अनजान नहीं।
रास्ते भले ही लंबे हों, कदम खुद-ब-खुद चल पड़ते हैं,
कुछ शहर नक्शे पर नहीं होते, दिल में होते हैं… ये राज़ नया नहीं।
ये तो ओपन सीक्रेट है…
-रतन कुमार कैथवास
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