आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हँसकर इसे निभा लो तुम

                
                                                         
                            आँसू से इतिहास न लिखना,
                                                                 
                            
हँसकर इसे निभा लो तुम।
अब ये दीप जला लो तुम,
मन का तम मिटा लो तुम।
जो भी टूटा जोड़ न पाए,
मरहम खुद बना लो तुम।

ठोकर ही पहचान बने तो,
उसको गले लगा लो तुम।
हार अगर दरवाज़ा खटके,
हिम्मत को बुला लो तुम।
किस्मत रूठी बैठी हो तो,
मेहनत से मना लो तुम।

रिश्तों की इस सूखी मिट्टी में,
नेह का जल बहा लो तुम।
जो शब्द कभी कह न पाए,
आँखों से बता लो तुम।
पत्थर जैसे दिल भी देखो,
प्रेम से पिघला लो तुम।

कल की राख कुरेदोगे तो,
हाथ ही बस जल जाएँगे।
आज की धूप समेटोगे तो,
रास्ते फिर खिल जाएँगे।
बीते दर्द की हर आहट को,
मुस्काकर भुला लो तुम।

जीवन कोई युद्ध नहीं है,
हर पल जीत ही हो जाए।
कभी किसी की हार में भी,
नई सुबह की रीत समाए।
अपने हिस्से की तन्हाई को,
गीतों में सजा लो तुम।
जब भी मन थकने लग जाए,
माँ की दुआ सुन लेना तुम।
पिता के चुप से संघर्षों को,
अपना हौसला कर लेना तुम।
गिरकर फिर से उठने का ही,
अर्थ ज़िंदगी बता लो तुम।

दीप वहीं सबसे ज़्यादा जलता,
जहाँ अँधेरा गहरा होता।
फूल वहीं सबसे ज़्यादा खिलता,
जहाँ धैर्य का पहरा होता।
आँसू से इतिहास न लिखना,
हँसकर इसे निभा लो तुम।
जो भी टूटा जोड़ न पाए,
मरहम खुद बना लो तुम,
अब ये दीप जला लो तुम।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर