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हम राख से उठने वाले हैं, चिंगारी से डरते नहीं,

                
                                                         
                            हम अंगारों का शर्बत पी जाएँ, क्या रखा है ऊँची उड़ानों में,
                                                                 
                            
हमने रास्ते ख़ुद पैदा किए, उलझे रहे नहीं बहानों में।
जिनके सीने में आग नहीं, वो क्या जानें जुनून की रवानी,
हमने अपनी उम्र गुज़ारी है, तूफ़ानों से आँख मिलाने में।

हमें ख़ौफ़ दिखाकर देखो मत, हम ख़ौफ़ को भी पी जाते हैं,
जो राहें दुनिया छोड़ दे, हम उन राहों पर जाते हैं।
हमारी फ़ितरत में झुकना नहीं, न बिकना है बाज़ारों में,
हम अपनी शर्तों पर जीते हैं, क्या रखा है एहसान जताने में।

हमें फूलों की चाह नहीं, काँटों से यारी रखते हैं,
जो आग परीक्षा बन जाए, हम उसकी चिंगारी रखते हैं।
तुम महफ़िल में नाम कमाओ, हम नया इतिहास बनाते हैं,
फ़र्क़ बहुत है जनाब, सिर्फ़ ख़्वाब सजाने और निभाने में।

न शोहरत का नशा हमें, न दौलत का अभिमान है,
हमारी मेहनत ही पहचान, हमारा संघर्ष सम्मान है।
जो अपनी धुन में चलते हैं, वो कब रुकते हैं ज़माने में,
मंज़िल उनके क़दम चूमे, दम हो अगर इरादों में।

हम राख से उठने वाले हैं, चिंगारी से डरते नहीं,
जो सच की राह पकड़ लें, वो अंजाम से डरते नहीं।
हम वक़्त के माथे पर लिख देंगे अपनी कहानी,
मरहबा, ये कैसा मंथन दिल का है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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