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घर से भागो...

                
                                                         
                            सुनो युवतियों,
                                                                 
                            
घर से भागो...
बॉय-फ्रेंड के साथ नहीं,
इतिहास, भूगोल, विज्ञान और साहित्य की किताबें लेकर।
जब तुम स्वयं,
अपना आसमान बन जाओगी,
तो कोई तुमसे,
पिंजरे का पता नहीं पूछेगा।

एक गाँव में…
दो लड़कियाँ रहती थीं।
एक ने कहा…
"मैं किसी के साथ भाग जाऊँगी,
यही मेरी आज़ादी होगी।"
दूसरी ने कुछ नहीं कहा।
उसने अपनी किताबें उठाईं,
रातों को लालटेन की रोशनी में पढ़ा,
दिन में सवाल पूछे,
गलतियाँ कीं,
डाँट भी खाई,
लेकिन पढ़ना नहीं छोड़ा।
बरसों बाद,
पहली लड़की,
एक घर की चौखट बदल चुकी थी।
दूसरी...
पूरे गाँव की सोच बदल रही थी।
मैंने उससे पूछा…
"क्या तुम्हें कभी,
भाग जाने का मन नहीं हुआ?"
वो मुस्कुराई।
बोली…
"हुआ था।
लेकिन मैंने सोचा,
अगर भागना ही है,
तो अँधेरे से भागूँ,
अज्ञान से भागूँ,
उस डर से भागूँ
जो बार-बार कहता था…
'तुम नहीं कर पाओगी।'"
मैंने कहा…
"और प्रेम?"
वो हँस दी।
बोली…
"प्रेम से किसने मना किया?
लेकिन प्रेम,
मंज़िल नहीं होना चाहिए,
सफ़र का साथी होना चाहिए।
अगर मेरा पूरा वजूद,
किसी एक इंसान के सहारे खड़ा है,
तो वह प्रेम नहीं,
निर्भरता है।"
इतने में
एक छोटी बच्ची,
अपना बस्ता लेकर वहाँ आई।
उसने पूछा…
"दीदी,
आसमान कितना बड़ा होता है?"
वो उसके पास बैठी,
उसके सिर पर हाथ फेरा,
और बोली…
"जितने बड़े तुम्हारे सपने,
उतना बड़ा तुम्हारा आसमान।"
बच्ची ने फिर पूछा…
"और पंख कहाँ मिलते हैं?"
उसने किताब खोलकर कहा…
"यहीं...
हर पन्ने में,
एक-एक पंख छिपा है।"
मैंने उस दिन जाना,
भागना हमेशा कायरता नहीं होता।
कभी-कभी,
सबसे बहादुर भागना, यह होता है
कि तुम उन सोचों से, दूर चली जाओ,
जो तुम्हें छोटा, बनाए रखना चाहती हैं।
और जब तुम,
ज्ञान, आत्मसम्मान और अपने हुनर के सहारे,
अपने पैरों पर खड़ी हो जाती हो,
तब तुम्हें कोई,
उड़ना नहीं सिखाता,
लोग तुम्हारी उड़ान देखकर,
अपने बच्चों के लिए,
आसमान चुनने लगते हैं।
इसलिए सुनो युवतियों…
अगर भागना ही है,
तो उस डर से भागो,
जो तुम्हारी आवाज़ दबा देता है।
उस अज्ञान से भागो,
जो तुम्हारे, सपनों की उम्र तय कर देता है।
किताबों का हाथ पकड़ो,
अपने विवेक को साथी बनाओ,
और फिर देखना...
जब तुम स्वयं अपना आसमान बन जाओगी,
तब प्रेम भी तुम्हें खोजेगा,
सम्मान भी तुम्हें खोजेगा,
और दुनिया तुम्हें किसी की परछाईं नहीं,
तुम्हारे अपने नाम से पहचानेगी।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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