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एक हरसिंगार ही काफी है, महकाने को संसार

                
                                                         
                            हरसिंगार के पेड़ के नीचे से, रात में गुज़रना ज़रा,
                                                                 
                            
लगता है ख़ुशबुओं ने खोल दिया हो, अपना ख़ज़ाना सारा।
जैसे टोकरी भर महक किसी ने, साँसों में बिखरा दी हो,
सोई हुई फ़िज़ा के माथे पर, चंदन की लकीर लगा दी हो।

रात की चादर ओढ़े पेड़, चुपके-चुपके महकता है,
उसकी ख़ुशबू का जादू, दिल के भीतर तक उतरता है।
हवा ज़रा-सी छेड़ दे तो, नशा-सा छाने लगता है,
मन का पंछी पंख पसारे, आसमान में जाने लगता है।

सफ़ेद फूल, केसरिया डंठल, धरती पर बिखरे रहते हैं,
जैसे चाँद के टूटे टुकड़े, रात से बातें करते हैं।
पाँव ठिठक जाते हैं ख़ुद ही, दिल आगे बढ़ता नहीं,
ऐसी मदहोश महक के आगे, कोई होश में रहता नहीं।

न इत्र की कोई शीशी, न गुलाबों का कारोबार,
एक हरसिंगार ही काफ़ी है, महकाने को संसार।
जिस राह से वो गुज़र जाए, मौसम बदलने लगता है,
सूखा-सूखा मन भी जैसे, सावन में ढलने लगता है।

ऐ हरसिंगार, तेरी ख़ुशबू का, कुछ ऐसा असर हुआ,
रात के सन्नाटे में भी, दिल बेख़बर-सा मस्त हुआ।
जी चाहे सारी रात यहीं, तेरी छाँव में गुज़ार दूँ,
तेरे फूलों की महक समेटूँ, या ख़ुद को ही बिसार दूँ।
-रतन कुमार कैथवास
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2 दिन पहले

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