नियति लेख…
दूसरे सिरे से लिखती है,
लेकिन हम,
उसे दूसरे सिरे से पढ़ते हैं।
यही वजह है कि,
जो हमें अंत दिखाई देता है,
वो शायद उसकी कहानी की,
शुरुआत होती है।
एक बूढ़ा कुम्हार,
मिट्टी का घड़ा बना रहा था।
मैंने पूछा,
"इतनी दरारों वाली मिट्टी क्यों चुनी?
इससे तो घड़ा टूट जाएगा।"
वो मुस्कुराया और बोला,
"तुम मिट्टी देख रहे हो,
मैं उसमें छिपा पानी देख रहा हूँ।"
उस वक़्त,
उसकी बात समझ नहीं आई।
बरसों बाद,
जब अपनी ज़िंदगी के पन्ने पलटे,
तो जाना कि जिन हादसों को,
मैं बदनसीबी समझता रहा,
उन्हीं ने मुझे उन लोगों से मिलवाया,
जो मेरी तक़दीर बन गए।
जिन रास्तों को मैंने,
'गलत मोड़' कहा था,
वही किसी मंज़िल का,
ज़रूरी चक्कर निकले।
जिन लोगों के जाने पर,
मैंने आसमान से शिकायत की,
वक़्त ने बताया…
अगर वो रुक जाते,
तो शायद मैं कभी, चलना ही न सीखता।
तब एहसास हुआ,
नियति कभी जल्दबाज़ी में, फ़ैसले नहीं लिखती।
वो पहले आख़िरी पंक्ति लिखती है,
फिर उसके योग्य घटनाएँ बुनती है।
और हम...
पहला पन्ना खोलकर ही,
पूरी किताब का फ़ैसला सुना देते हैं।
इसलिए अब,
जब कोई घटना समझ नहीं आती,
मैं उसे अधूरा छोड़ देता हूँ।
क्योंकि हर कहानी का अर्थ,
पहले अध्याय में नहीं मिलता।
कुछ किताबें,
आख़िरी पन्ने पर जाकर बताती हैं,
कि शुरुआत में जो आँसू थे,
वो हार के नहीं,
एक गहरे अर्थ की प्रस्तावना थे।
शायद इसलिए जीवन का सबसे बड़ा धैर्य यही है…
हर पंक्ति का मतलब, उसी क्षण जानने की ज़िद न करना।
क्योंकि नियति, लिखते समय अंत जानती है,
और हम पढ़ते समय केवल वर्तमान।
-रतन कुमार कैथवास
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