मुझे मेरा दिल,
बहुत बड़ा लगता था।
एक दिन विज्ञान के गुरुजी ने बताया…
"वयस्क पुरुष का दिल लगभग 350 ग्राम का होता है।
वयस्क महिला का दिल लगभग 300 ग्राम का होता है |”
मैं तो हिल गया।
मैंने कहा…
"गुरुजी,
इतने छोटे-से दिल में
इतनी सारी यादें कहाँ रहती हैं?
इतनी मोहब्बत,
इतनी नफ़रत,
इतने अधूरे ख़्वाब,
इतने बिछड़ने के दर्द...
ये सब सिर्फ़ साढ़े तीन सौ ग्राम में?"
गुरुजी मुस्कुराए।
बोले…
"विज्ञान दिल का वज़न बताता है,
उसकी गहराई नहीं।"
मैंने फिर पूछा…
"तो फिर लोग क्यों कहते हैं…
'उसका दिल बहुत बड़ा है'?"
उन्होंने खिड़की के बाहर,
एक बरगद के पेड़ की ओर इशारा किया।
बोले…
उस बरगद के बीज को देखो,
जिससे यह पेड़ निकला होगा।
वज़न उसका भी,
बहुत कम होता है।
लेकिन उसके भीतर,
पूरा जंगल छिपा था।"
मैं चुप हो गया।
उन्होंने आगे कहा…
"हर चीज़ का आकार,
उसकी क्षमता तय नहीं करता।
छोटी-सी आँख,
पूरा आसमान देख लेती है।
छोटा-सा कान,
ज़िंदगी भर की आवाज़ें सँभाल लेता है।
और यह छोटा-सा दिल...
कई बार,
पूरी एक दुनिया उठा लेता है।"
मैंने हँसकर कहा…
"फिर तो किताबों में लिख देना चाहिए…
दिल 350 ग्राम का नहीं,
कभी-कभी कई जन्मों का होता है।"
गुरुजी भी हँस पड़े।
बोले…
"नहीं...
विज्ञान को विज्ञान रहने दो।
उसे कविता मत बनाओ।"
मैंने शरारत से कहा…
"लेकिन गुरुजी,
अगर विज्ञान सच बता सकता है,
तो कविता उसका मतलब बता सकती है।"
उन्होंने पहली बार
मेरी पीठ थपथपाई।
और बोले…
"यही फ़र्क़ है,
जानकारी और समझ में।
जानकारी कहती है…
दिल 350 ग्राम का है।
समझ कहती है…
उसी 350 ग्राम में,
एक माँ अपने बच्चे के लिए,
पूरी उम्र की यादें रख देती है,
एक प्रेमी किसी की याद,
एक सैनिक अपना वतन,
और एक कवि...
पूरी कायनात।"
उस दिन घर लौटते समय,
मैंने अपने सीने पर हाथ रखा,
और मुस्कुराकर कहा…
"गुरुजी सही थे...
दिल का वज़न सचमुच 350 ग्राम होगा।
लेकिन उसे भारी,
उसका मांस नहीं,
उसमें रखे हुए रिश्ते बनाते हैं।"
तब से जब भी कोई कहता है…
"दिल कितना बड़ा है?"
मैं मुस्कुराकर जवाब देता हूँ…
"तराज़ू से मत मापिए साहब,
कुछ चीज़ें वज़न से नहीं,
वजूद से बड़ी होती हैं।"
-रतन कुमार कैथवास
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