चंदन के बाग़-सी ठंडक है, रात की चाँदनी में,
जुगनू-से तारे चमक रहे हैं, आसमाँ की रागिनी में।
हवा भी आज ख़ुशबू लेकर, धीरे-धीरे चल रही,
किसी के ख़्वाबों की महफ़िल, रात की ख़ामोशी में पल रही।
चाँद ने चुपके से खोला है, रूपहला-सा अपना राज़,
सितारों की महफ़िलों में, छिड़ रहा है प्रेम का साज़।
नीम की शाखों पर जैसे, चाँदी उतर आई हो,
रात ने काली चुनरिया पर, मोतियों की झालर सजाई हो।
दूर तक फैली हुई है, चाँदनी की शीतल धार,
पत्तियों पर मोती बनकर, ठहर गई ओस की बहार।
फूल भी ख़ामोश रहकर, अपनी ख़ुशबू बाँटते हैं,
रात के इस हुस्न पर, चाँद-सितारे रीझ जाते हैं।
झील के पानी में चंदा, अपना चेहरा देखता,
लहर का हर एक झोंका, प्रेम का संदेश देता।
ऐसी मदहोश फ़िज़ा में, दिल भला चुप क्यों रहे,
चाँदनी जब गीत गाए, मन बिना धुन क्यों रहे।
रात चंदन-सी महकती है, सितारे मुस्कुराते हैं,
चाँद के आँचल तले, कितने सपने जगमगाते हैं।
कुदरत की इस महफ़िल में, दिल को सुकून मिल रहा,
जैसे धरती की हथेली पर, आसमाँ का प्यार खिल रहा।
-रतन कुमार कैथवास
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