कपूर जला कर हाथ में अपने, शंकर को खुश करता है,
मन के अँधियारों में बोल, कौन-सी धूप जलाता है?
माथे पर चंदन लगा लिया, कंठ में रुद्राक्ष सजा लिया,
भीतर बैठा लोभ का रावण, उसको कौन जलाता है?
मंदिर-मंदिर शीश झुकाए, घंटी खूब बजाता है,
अपने मन के मैल को लेकिन, क्यों न कभी धुलवाता है?
बेलपत्र की थाली लेकर, भोले के दर जाता है,
भूखे को दो रोटी देकर, क्या कभी लौटकर आता है?
गंगा जल से चरण पखारे, मन में बैर छुपाए है,
भोले की महिमा गाता है, मानव को ठुकराए है।
किस पूजा का फल माँगे तू, किस वरदान की आशा है,
जिसके दिल में प्रेम नहीं, उसका कैसा उपवास है?
धूप जला ले, दीप जला ले, लाख मंत्र दोहराए तू,
जब तक भीतर अहंकार है, कैसे शिव को पाए तू?
शिव तो बैठे हैं कण-कण में, हर प्राणी के प्राणों में,
किस पत्थर में ढूँढ़ रहा है, उनको अपने अरमानों में?
कपूर जले तो राख बचे, मन का अंधियारा मिटना चाहिए,
शिव के आगे झुकने से पहले, मनुष्य बनना चाहिए।
दया जगे और प्रेम खिले, तो सच्ची पूजा हो जाए,
मन-मंदिर में शिव बस जाएँ, जीवन शिवमय हो जाए।
-रतन कुमार कैथवास
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