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दरिया और समुंदर - अपना अपना सौंदर्य

                
                                                         
                            गिरते हैं हज़ारों दरिया
                                                                 
                            
समुंदर में,
पर कोई समुंदर
किसी दरिया में क्यों नहीं गिरता?
ये कैसा फ़लसफ़ा है?
मैंने यह सवाल,
एक बूढ़े नाविक से पूछा।
वो किनारे बैठा,
अपने जाल की टूटी गाँठें बाँध रहा था।
उसने मेरी तरफ़ देखा,
मुस्कुराया,
और बोला…
"तुम्हें सच में जवाब चाहिए,
या सिर्फ़ एक अच्छी शायरी?"
मैंने कहा…
"इस बार शायरी नहीं,
ज़िंदगी समझनी है।"
वो उठा,
मुझे किनारे तक ले गया।
एक नदी,
शांत होकर समुंदर की ओर बढ़ रही थी।
उसने पूछा…
"बताओ,
ये नदी समुंदर में गिर रही है,
या समुंदर इसे अपने भीतर जगह दे रहा है?"
मैं चुप रह गया।
उसने फिर कहा…
"बेटा,
जिसे तुम 'गिरना' कह रहे हो,
प्रकृति उसे 'मिलना' कहती है।"
मैंने पूछा…
"तो समुंदर,
किसी नदी में क्यों नहीं जाता?"
वो हँस पड़ा।
बोला…
"अगर समुंदर
हर नदी में उतरने लगे,
तो न समुंदर बचेगा,
न नदी।
कुछ रिश्तों में,
एक का विशाल होना ही,
दूसरे के बहाव को, अर्थ देता है।"
मैंने कहा…
"फिर क्या हमेशा,
नदी को ही सफ़र करना पड़ता है?"
वो कुछ देर तक,
लहरों को देखता रहा।
फिर बोला,
"हाँ...
क्योंकि जो चल पड़ता है,
उसी को मंज़िल मिलती है।
समुंदर अपनी जगह रहता है,
लेकिन उसकी विशालता ही,
हर नदी को अपनी ओर खींचती है।"
मैंने फिर पूछा…
"क्या इंसानों में भी ऐसा होता है?"
उसने जाल समेटते हुए कहा…
"बहुत होता है।
जिस इंसान के भीतर,
गहराई होती है,
लोग ख़ुद उससे मिलने आते हैं।
उसे किसी के पीछे,
भागना नहीं पड़ता।
और जो हर किसी के पीछे,
अपनी पहचान लेकर दौड़ता है,
वो अक्सर, अपनी ही धारा खो देता है।"
सूरज डूबने लगा था।
नदी की आख़िरी लहर,
समुंदर में समा गई।
मैंने देखा…
न नदी रोई,
न समुंदर हँसा।
दोनों बस,
एक-दूसरे का हिस्सा हो गए।
तब बूढ़े नाविक ने,
आख़िरी बात कही,
"याद रखना...
नदी का सौंदर्य,
उसके बहने में है,
और समुंदर का सौंदर्य,
उसके समेट लेने में।
ज़िंदगी में कभी नदी बनना,
कभी समुंदर।
बहना भी सीखना,
और किसी को बिना शोर,
अपने भीतर जगह देना भी।"
उस दिन समझ आया,
फ़लसफ़ा यह नहीं कि,
समुंदर किसी दरिया में क्यों नहीं गिरता।
फ़लसफ़ा यह है कि,
जिसके भीतर सचमुच समुंदर होता है,
उसे अपनी विशालता साबित करने के लिए,
किसी के दरवाज़े पर बहकर नहीं जाना पड़ता।
वह अपनी जगह ठहरकर भी,
हज़ारों दरियाओं को अपनापन दे देता है।
-रतन कुमार कैथवास
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3 महीने पहले

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