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डर को हराया था

                
                                                         
                            बाद में पछताने से बेहतर है,
                                                                 
                            
क्यों न हम…
अपनी पूरी ताक़त लगाकर,
इतिहास रच दें।
चलो आज उस मोड़ तक चलते हैं,
जहाँ लोग कदम रखने से पहले,
हज़ार बहाने गिनाते हैं,
हम बिना शोर किए,
बस अपना पहला क़दम बढ़ाते हैं।
रास्ते ने मुस्कुराकर पूछा,
"अगर हार गए तो?"
मैंने धूल झाड़ते हुए कहा,
"हार तो वही मानते हैं
जो कोशिश से पहले ही, लौट आते हैं।"
पहाड़ सामने खड़ा था,
हवा भी उसके साथ थी,
हर पत्थर कह रहा था…
"यहीं रुक जाओ..."
मगर दिल ने पहली बार,
दिमाग़ से ऊँची आवाज़ में कहा…
"आज नहीं, इस बार नहीं।"
पसीने की हर बूँद,
ज़मीन पर गिरकर,
एक नई इबारत लिख रही थी।
ज़ख्म भी अजीब थे,
दर्द देते कम थे,
हौसला ज़्यादा बढ़ाते थे।
शाम तक मंज़िल नहीं मिली,
लेकिन डर कहीं, पीछे छूट गया था।
तब समझ आया…
इतिहास मंज़िल पर पहुँचकर नहीं,
डर से आगे निकलकर, लिखा जाता है।
जब रात आई,
तो आसमान के सितारे,
पहली बार, इतने अपने लगे।
जैसे कह रहे हों…
"हम भी कभी, अँधेरे से लड़कर ही चमके थे,
तुम भी चमको,
बस आख़िरी कोशिश मत छोड़ना।"
और अगर कल लोग पूछें,
"तुम्हारी सबसे बड़ी जीत क्या थी?"
तो मुस्कुराकर इतना कहना…
"जीत तो बाद में मिली,
पहले मैंने, अपने डर को हराया था।
बाक़ी इतिहास,
उसके बाद खुद-ब-खुद लिखता चला गया।"
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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