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छाँव लुटाता था

                
                                                         
                            मासूम सा चेहरा था, जब रहगुज़र में मिलता था,
                                                                 
                            
अब जाने कहाँ होगा, किस हाल में वो होगा।

तपती हुई धरती है, और साथ नदी बहती,
प्यासे से इन लम्हों में, यादों की नमी रहती।

बंजारों की बस्ती में, हर रोज़ दिवाली है,
फिर भी किसी चेहरे पर, इक गहरी सी लाली है।

वो धूप में चलता था, पर छाँव लुटाता था,
अपने ही दुखों को भी, हँसकर छुपाता था।

कुछ ख़्वाब थे आँखों में, कुछ रेत की मानिंद,
मुट्ठी में जो ठहरे थे, किस्मत ने उड़ा डाले।

हर मोड़ पे किस्सों ने, आवाज़ लगाई है,
हर दर्द की चौखट पर, उम्मीद भी आई है।

पत्थर भी पिघलते हैं, जब प्यार बरसता है,
सूखा हुआ दरिया भी, उस रोज़ तो हँसता है।

अब शाम उतरती है, चुपचाप मकानों में,
पर नाम तेरा अब भी, ठहरा है फ़िज़ाओं में।

जो लोग बिछड़ते हैं, शायद लौट के नहीं आते,
लेकिन उनकी यादें तो, कई बरसों तक नहीं जाती।

मासूम सा लगता है, जब ख़्वाब में मिलता है,
लगता है अभी भी वो, दिल में ही रहता है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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