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चना क्यों चबाना है

                
                                                         
                            काग़ज़ की नाव नहीं, लोहे का चना क्यों चबाना है,
                                                                 
                            
कैसे स्थिर हो मन अपना, जब ज़ंजीर बँधी हो पाँवों में।

फिर भी ठान लिया है हमने, बेड़ियाँ ही पिघलाएँगे,
जिसने रोका है राहों में, उसको राह सिखाएँगे।

पत्थर चाहे लाख बिछाओ, पग रुकने वाले कब थे,
हमने काँटों की बस्ती में भी, फूल उगाने के सबक़ रटे थे।

आँधी से समझौता करके, दीप नहीं जल पाते हैं,
जो तूफ़ानों से भिड़ जाते हैं, वही सवेरे लाते हैं।

मंज़िल उनके घर चलती है, जो थककर भी चलते हैं,
इतिहास उन्हीं के हिस्से आता, जो वक़्त से आगे निकलते हैं।

ज़ख्म अगर तक़दीर ने दिए, उनको तमगा कर लेंगे,
हार अगर दरवाज़ा खटखटाए, हँसकर बाहर कर देंगे।

लोहा आग में तपता है, तब जाकर खंजर बनता है,
इंसान भी लड़कर, अपने वक़्त का सरदार यानी महाकाल बनता है।

अब पाँवों की ज़ंजीरों से, डरने का मौसम बीत गया,
जिस दिन हौसला जाग उठे, हर ताला ख़ुद ही टूट गया।

ये दुनिया ताक़त पूछेगी, बहानों का हिसाब नहीं,
जो पर्वत का सीना चीर सके, उसके आगे कोई ख़्वाब नहीं।

चलना है तो इस अंदाज़ में चल, कि राहें सलाम किया करें,
इरादे इतने बुलंद रख, कि मंज़िलें भी इंतज़ार किया करें।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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