शिकायत नहीं,
सुझाव चाहिए…
इन आँखों में बरसात नहीं,
छलकते खुशी के, जज़्बात चाहिए।
वो चुपचाप,
खिड़की के पास बैठी थी।
बारिश बाहर भी हो रही थी,
और भीतर भी।
फ़र्क़ बस इतना था…
बाहर की बारिश,
छत से टकराकर थम जाती थी,
भीतर की बारिश,
आँखों तक पहुँचकर भी,
बाहर आने से डर रही थी।
मैंने धीरे से कहा…
"अगर कोई बात खटक रही है,
तो उसे ग़ुस्से की गठरी मत बनाओ।
शब्दों में खोल दो।
शिकायतों की दीवारें,
घर नहीं बचातीं,
सुझावों की खिड़कियाँ,
हवा आने देती हैं।"
वो मेरी ओर देखती रही,
जैसे कोई बच्चा,
टूटे हुए खिलौने को,
फिर से जोड़ने की, उम्मीद कर रहा हो।
मैंने मुस्कुराकर,
उसके हाथ पर, अपना हाथ रखा और कहा…
"मुझे तुम्हारी आँखों में,
बरसात नहीं चाहिए।
ये आँसू…
ज़मीन तो भिगो देंगे,
लेकिन रिश्ते की जड़ों को,
धूप नहीं दे पाएँगे।
मुझे तो बस,
तेरे मन की खुशी चाहिए।
वही खुशी,
जो बिना वजह,
चाय को मीठा कर देती है,
जो बिना त्योहार,
घर में दीप जला देती है,
जो बिना किसी गीत के,
होठों पर धुन बन जाती है।"
वो पहली बार मुस्कुराई।
इतनी धीमी,
जैसे बादलों के पीछे से,
सूरज झाँक रहा हो।
मैंने कहा…
"देखो,
मतभेद होना,
रिश्तों की बीमारी नहीं है।
बिना बोले रह जाना,
ज़रूर बीमारी बन जाता है।
इसलिए जब भी कुछ गलत लगे,
शिकायत मत करना,
सुझाव देना।
क्योंकि शिकायत,
हार मान लेती है,
और सुझाव,
साथ चलने का रास्ता खोजती है।"
उसने सिर हिलाया,
चाय का आख़िरी घूँट लिया,
और बोली…
"आज समझ आया,
रिश्ते जीतने से नहीं,
एक-दूसरे को, समझने से चलते हैं।"
मैंने हँसकर जवाब दिया…
"बस यही तो चाहता हूँ...
इन आँखों में बरसात नहीं,
तेरे मन की खुशी चाहिए।
बाक़ी दुनिया से लड़ने का हौसला,
हम दोनों मिलकर जुटा ही लेंगे।"
-रतन कुमार कैथवास
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