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बॉर्डर - एक वायदे की लकीर

                
                                                         
                            बार्डर पर…
                                                                 
                            
यहाँ मिट्टी भी, शपथ लेकर साँस लेती है,
हर कदम पर इतिहास की धड़कन सुनाई देती है।
जो पहरा देते हैं इन सरहदों का,
वे केवल ज़मीन नहीं,
करोड़ों सपनों की नींद की हिफ़ाज़त करते हैं।

यहाँ रातें अँधेरे से नहीं डरतीं,
क्योंकि चौकियों पर जलते हौसले,
सूरज से पहले उजाला कर देते हैं।
हर वर्दी के भीतर,
एक घर भी धड़कता है,
जिसने अपने हिस्से की खुशियाँ,
देश के नाम लिख दी हैं।

सीमा की बर्फ़ हो या तपता रेगिस्तान,
हर मौसम से एक ही संवाद होता है…
"जब तक साँसों में दम बाकी है,
तिरंगे की ओर बढ़ने वाला,
हर नापाक क़दम,
यहीं रुक जाएगा।"
इन सपूतों की माँएँ अपने बेटे को विदा करती है,
तो आँसू नहीं, आशीर्वाद देती है।

कहती है…
"अगर लौटना, तो सीना ऊँचा करके लौटना,
और अगर न लौट सको,
तो तिरंगे में लिपटकर आना,
ताकि पूरा वतन तुम्हें सलाम कर सके।"
सरहदें नफ़रत की दीवार नहीं,
विश्वास की अंतिम चौकी होती हैं।
जहाँ खड़ा हर प्रहरी,
अपने रक्त से यह लिखता है…
"हम हैं तो भारत है,
और जब तक भारत है,
इस वायदे की लकीर
कभी मिटने नहीं देंगे।"
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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