क्या भगोने में उबलते हुए दूध में,
छत से टपकते हुए पानी में,
या घुमड़ते बादल में,
या और कहीं...
कुछ तो इशारा दो मुझे।
क्या सुबह की पहली किरण में हो,
या शाम की ठहरी हुई लाली में,
क्या मंदिर की बजती घंटियों में,
या किसी फ़क़ीर की ख़ाली थाली में।
हर तरफ़ तेरा ही चेहरा दिखता है,
अब सच का किनारा दो मुझे।
क्या चाय की उठती भाप में हो,
या भीगी हुई मिट्टी की ख़ुशबू में,
क्या किसी पुराने ख़त की लिखावट में,
या अधूरी-सी किसी आरज़ू में।
यूँ पहेलियाँ मत बुझाया करो,
ज़रा अपना पता दो मुझे।
क्या चिड़ियों की चहचहाहट में हो,
या नदी के बहते हुए राग में,
क्या बच्चों की मासूम हँसी में हो,
या किसी सूफ़ियाना फ़रियाद में।
हर आवाज़ तेरी लगती है,
अब अपना स्वर सुना दो मुझे।
क्या बरगद की ठंडी छाँव में हो,
या तपते हुए रेगिस्तान में,
क्या पहली बारिश की बूँदों में,
या किसी वीरान मकान में।
मैं हर दर पर दस्तक देता हूँ,
एक बार तो मिल लो मुझसे|
क्या आईने की ख़ामोशी में हो,
या मेरी धड़कनों के सफ़र में,
क्या साँसों के आने-जाने में,
या मेरी हर छोटी-सी ख़बर में।
अगर इतना क़रीब ही रहते हो,
तो फिर यूँ न सताया करो मुझे।
फिर कहीं भीतर से,
एक धीमी-सी आवाज़ आई…
"बाहर की दुनिया में क्यों भटकते हो?
मैं न उबलते दूध में हूँ,
न टपकती छत में,
न बादलों की भीड़ में।
मैं तो हर उस एहसास में हूँ,
जहाँ तुम्हारा मन,
बिल्कुल निर्मल हो जाता है।
ज़रा ख़ुद से मिलो...
वहीं मेरा सबसे पक्का पता मिलेगा तुम्हें।"
-रतन कुमार कैथवास
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