जिस भी क्षेत्र में काम करो,
इल्म ऐसा पैदा करो कि, सदियों से जमी हुई सोच में, भूचाल आ जाए।
ऐसा नहीं कि लोग, सिर्फ़ तुम्हारा नाम जानें,
बल्कि तुम्हारे काम से, अपने तरीक़े बदल दें।
एक दिन मैंने एक बुज़ुर्ग कारीगर से पूछा,
"उस्ताद, आपकी दुकान पर इतनी भीड़ क्यों रहती है?"
वो मुस्कुराए और बोले…
"मैं सामान नहीं बेचता बेटा,
मैं अपने हुनर पर लोगों का भरोसा बेचता हूँ।"
फिर उन्होंने अपनी पुरानी हथौड़ी उठाई,
जिसका लकड़ी का हत्था घिस चुका था।
बोले…
"लोहे पर जितनी चोट ये हथौड़ी करती है,
उससे कहीं ज़्यादा चोट मैंने,
अपने आलस, अपने डर और अपनी कमियों पर की है।"
तब समझ आया…
भूचाल शोर से नहीं आता,
बरसों की ख़ामोश मेहनत से आता है।
अगर डॉक्टर बनो,
तो ऐसी खोज करो कि दर्द की परिभाषा बदल जाए।
अगर शिक्षक बनो,
तो ऐसी पीढ़ी तैयार करो कि इतिहास नया लिखे।
अगर किसान बनो,
तो खेत तुम्हारी सोच से लहलहाएँ।
अगर लेखक बनो,
तो कलम से सोई हुई आत्माएँ हड़बड़ा कर जाग उठें।
याद रखना,
डिग्रियाँ दीवारों पर टँग जाती हैं,
लेकिन इल्म लोगों के दिलों और समाज की रगों में बहता है।
इतना गहरा उतर जाओ, अपने फ़न में,
कि तुम्हारी मौजूदगी से, औसत-पन काँपने लगे।
तुम्हारा हर काम ये गवाही दे…
कि किसी ने सिर्फ़ रोज़ी कमाने के लिए नहीं,
बल्कि दुनिया में एक नई लकीर खींचने के लिए जन्म लिया है।
इसलिए मैं कहता हूँ…
जिस भी क्षेत्र में कदम रखो,
ऐसी पहचान बनाओ कि वक़्त तुम्हें याद रखे।
इल्म ऐसा पैदा करो,
जो सिर्फ़ तालियाँ नहीं,
ज़माने की सोच में भूचाल पैदा कर दे।
-रतन कुमार कैथवास
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