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भीतर संजोये रखते हैं

                
                                                         
                            अपने आँसू के समंदर से,
                                                                 
                            
नमक अलग करने के लिए बैठी है,
शायद उसे यक़ीन है,
दर्द को छान देने से यादें मीठी हो जाएँगी।
मैंने पूछा,
"ये कैसा काम है,
जिसका कोई अंजाम नहीं?"
वो मुस्कुराई,
मगर मुस्कुराहट भी भीगी हुई थी।
बोली…
"कुछ लोग चले तो जाते हैं,
पर उनकी बातें, आँखों में घुली रह जाती हैं।
मैं बस उन्हें धोना चाहती हूँ।"
उसने हथेलियों में,
दो बूँदें रोककर रखीं,
फिर देर तक उन्हें देखती रही,
जैसे हर बूँद में,
एक अधूरी बातचीत कैद हो।
मैंने कहा,
"समंदर से नमक नहीं निकाला जाता,
उसे बस स्वीकार किया जाता है।"
वो धीरे से बोली,
"जानती हूँ...
पर जब तक कोशिश करती रहूँगी,
मुझे लगेगा कि मैंने हार नहीं मानी।"
शाम उतर आई,
आँसू सूख गए,
हथेलियों पर बस, सफ़ेद-सी एक परत बची थी।
वो उसे देखकर मुस्कुराई और बोली,
"देखो...
ये नमक नहीं है,
ये उन लोगों की याद है,
जिन्होंने मुझे हँसाकर भी,
रोना सिखा दिया।"
तब समझ आया,
कुछ लोग आँसू नहीं पोंछते,
उन्हें पढ़ते हैं।
और कुछ लोग आँसू बहाते नहीं,
उन्हें उम्र भर
नमक की तरह, अपने भीतर सँजोए रखते हैं।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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