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भारतीय मानसून

                
                                                         
                            भारत का वास्तविक वित्त मंत्री... यानी भारतीय मानसून।
                                                                 
                            
इतना कहा मैंने,
तो चौपाल पर बैठे बूढ़े किसान ने,
एक मुट्ठी मिट्टी उठाई,
उसे हथेली पर फैलाकर मुस्कुराया और बोला…
"बेटा, दिल्ली में बजट पढ़ा जाता है,
लेकिन खेतों का बजट तो आसमान लिखता है।"
मैंने पूछा…
"कैसे?"
वो बोला…
"जब बादल समय पर आते हैं,
तो किसान की आँखों में उम्मीद उगती है।


कुएँ भरते हैं,
नदियाँ गुनगुनाती हैं,
बाज़ारों में रौनक लौटती है,
और शहरों के चूल्हे भी,
गाँव की फसल से ही जलते हैं।"
इतने में,
एक बच्चा मिट्टी में अपनी उँगली से,
धान की बालियाँ बना रहा था।
बाबा ने उसकी तरफ़ इशारा करके कहा…
"देखो...
देश की पहली कमाई,
शेयर बाज़ार से नहीं,
इसी मिट्टी से निकलती है।"

मैंने आसमान की ओर देखा।
बादल अभी दूर थे।
बाबा ने लंबी साँस लेकर कहा…
"मानसून रूठ जाए,
तो सरकारी फ़ाइलों में लिखे आँकड़े,
किसान की सूखी हथेली नहीं भर सकते।
और अगर मानसून मेहरबान हो जाए,
तो आधे संकट,
बिना किसी आदेश के हल हो जाते हैं।"

उसी समय,
पहली बूँद आकर,
सूखी धरती पर गिरी।
मिट्टी से उठी सौंधी महक ने,
ऐसा स्वागत किया,
जैसे किसी घर का बिछड़ा बेटा,
बरसों बाद लौट आया हो।

बाबा की आँखें चमक उठीं।
वो बोले…
"लो...
देश का असली हिसाब-किताब
अब शुरू हुआ।"
मैंने पूछा…
"तो क्या सचमुच,
भारत का असली वित्त मंत्री मानसून ही है?"

वो हँस पड़े।
फिर अपनी लाठी उठाकर बोले…
"बेटा,
बजट, संसद में तालियाँ ज़रूर बटोरता है,
लेकिन उसकी सफलता की मुहर,
बादल लगाते हैं।
जब खेत हरे होते हैं,
तभी मंडियाँ मुस्कुराती हैं,

मंडियाँ मुस्कुराएँ तो बाज़ार साँस लेते हैं,
और बाज़ार साँस लें,
तो देश की धड़कन तेज़ हो जाती है।
इसलिए याद रखना…
भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे पुरानी कलम,
न किसी मंत्रालय में रखी है,
न किसी तिजोरी में...
वो तो हर साल,
काले बादलों के हाथ में होती है,
जो तय करते हैं कि,
इस बार धरती की जेब भरेगी,
या किसान की आँखें।"
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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