मैंने बारिश की दुआ माँगी,
जबकि छत टपकती रही मेरे घर की।
आईने में सिमटे हुए लोग,
बरगद की बातें कब से करने लगे...
इतना कहा ही था मैंने,
कि बूढ़े बाबा ने चिलम एक तरफ़ रखी,
और मुस्कुराकर बोले…
"बेटा, सबसे बड़ा धोखा वही देता है,
जो अपनी औक़ात भूले बिना,
औरों की औक़ात नापने निकल पड़े।"
मैंने पूछा… "कैसे?"
बोले…
"जिसके घर की दीवारें,
पहली बरसात में भीग जाती हैं,
वो भी कभी-कभी,
दूसरों के महलों में नमी ढूँढ़ने लगता है।"
मैं चुप रहा...
उधर छत से पानी की बूँदें
एक-एक करके ज़मीन पर गिर रही थीं।
हर बूँद जैसे कह रही हो…
"पहले मुझे रोक लो,
फिर दरिया की फ़िक्र करना।"
इतने में चौपाल पर बैठे लोग,
बरगद की छाँव के किस्से सुनाने लगे।
मैंने गौर से देखा...
उनमें से किसी ने,
बरगद लगाया ही नहीं था।
सबने बस तस्वीरों में देखी थी उसकी जड़ें,
और बात ऐसे कर रहे थे,
जैसे सदियों से उसी की छाया में पले हों।
मैंने हँसकर कहा…
"अजीब दौर है...
आईने में अपना कद पूरा दिखाई नहीं देता,
मगर ख़्वाब सबको बरगद जितने चाहिए।"
एक बुज़ुर्ग ने मेरी बात सुन ली।
धीरे से बोले…
"बेटा,
बरगद बनने के लिए,
ज़मीन में उतरना पड़ता है,
आईने में खड़े होकर,
कोई पेड़ नहीं उगता।"
उनकी बात सीधी दिल में उतर गई।
मैंने उसी रात,
टपकती छत के नीचे बैठकर,
बारिश को गौर से देखा।
समझ आया...
दुआ बारिश की नहीं,
हिम्मत की माँगनी चाहिए थी।
क्योंकि...
जिस घर की छत अभी भी टपक रही हो,
उसे बादलों से शिकायत नहीं,
अपने हाथों में औज़ार तलाशने चाहिए।
और जो लोग आईने की चौखट से बाहर निकल नहीं पाए,
उन्हें बरगद की नहीं,
पहले एक छोटे-से पौधे की ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए।
क्योंकि छाया भाषणों से नहीं,
जड़ों से पैदा होती है।
-रतन कुमार कैथवास
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