क्यों इतने ख़ामोश बैठे हो, उसने कोई सज़ा सुना दी है क्या?
उल्फ़त में तो सज़ाएँ सुनाई जाती रहती हैं,
अब उसे भी मंज़ूर करना पड़ेगा।
मगर हैरत तो इस बात की है,
तुम बग़ावत क्यों नहीं करते,
हर फ़ैसला इतनी आसानी से क़ुबूल क्यों कर लेते हो?
कहो, क्या इश्क़ ने तुम्हारी आवाज़ गिरवी रख ली है,
या उसकी एक नज़र ने सारी दलीलें छीन ली हैं।
जिस अदालत में मुजरिम भी तुम, गवाह भी तुम,
वहाँ हर फ़ैसला अपने ही ख़िलाफ़ क्यों लिखते हो तुम।
ज़ुल्म अगर हद से बढ़ जाए, तो इंकार भी इबादत है,
हर बार सिर झुका देना कहाँ मोहब्बत की शराफ़त है।
कभी तो अपने हिस्से का सवाल भी उठा लिया करो,
हर इल्ज़ाम अपने माथे क्यों सजा लिया करो।
वो अगर रूठा है, तो उसे भी मनाना होगा,
रिश्ता एक तरफ़ा नहीं, उसे भी निभाना होगा।
मोहब्बत का मतलब ख़ुद को मिटा देना नहीं होता,
किसी की ख़ुशी में अपना वजूद भुला देना नहीं होता।
जो हर बार बिना कसूर के सज़ा कबूल कर लेता है,
एक दिन वही अपने ही दिल में बेगुनाह होकर भी हार जाता है।
कभी ख़ामोशी की हथकड़ियाँ भी तोड़कर देखो,
अपने हक़ में दो लफ़्ज़ जोड़कर देखो।
अगर मोहब्बत सच्ची है, तो सवालों से नहीं डरेगी,
दो सच्चे दिलों के बीच बातचीत ही हर दूरी हर लेगी।
और अगर तुम्हारी ख़ामोशी ही उसे जीत लगती है,
तो याद रखना…
कभी-कभी बग़ावत रिश्ता तोड़ती नहीं,
रिश्ते को बराबरी पर खड़ा कर देती है।
-रतन कुमार कैथवास
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