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बाकी, दास्ताँ ही सही

                
                                                         
                            सँवर के चलो उस गली की तरफ़,
                                                                 
                            
महकी राहें हैं, चलें कुछ जुदा ही सही,
बातें करेंगे अगले जनम तक के लिए,
आज की रात रहे कुछ ख़फ़ा ही सही।

चाँद आहट भी देगा अगर रात में,
बैठा लेंगे उसे अपने ही साथ में,
कह देंगे… ठहर, अभी बातें बाकी हैं,
आज नींद आए न आए, गिला ही सही।

तेरी आँखों में जो शाम ढलती रही,
मेरी धड़कन उसी नाम पर चलती रही,
किस तरह छोड़ दें बात आधी यहाँ,
एक किस्सा है बाकी, दास्ताँ ही सही।

तू कहेगी कि अब देर हो जाएगी,
मैं कहूँगा ये रात फिर न लौट के आएगी,
जो उलफ़त में कहने को बाकी रहा,
वो कहेंगे कभी फिर, जहाँ भी सही।

कैसे बातें अधूरी छोड़कर हम उठें,
कैसे ख़्वाबों को यूँ बीच राहों में छोड़ें,
तू ज़रा और ठहर, मैं ज़रा और कहूँ,
ज़िंदगी कम है, लेकिन ये चाहत बड़ी।
-रतन कुमार कैथवास
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7 घंटे पहले

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