गर्मी की दोपहरी थी,
आम के बाग में, खटिया बिछाकर लेटा हुआ था।
लोहे की एक बाल्टी में,
हैंडपम्प के ठंडे पानी में,
चूसने वाले देशी आम ठंडे हो रहे थे।
नीम और आम की मिली-जुली छाँव,
धूप से एक अनकहा समझौता कर रही थी,
पत्तों के बीच से छनकर आती रोशनी,
खटिया पर ऐसे बिखर रही थी,
मानो किसी ने धूप की चादर पर,
हरे रंग की कढ़ाई कर दी हो।
दूर कुएँ की जगत से,
रस्सी की चर्र-चर्र सुनाई देती थी,
और कहीं किसी कोयल की कूक,
दोपहर की ख़ामोशी पर,
अपना नाम लिख रही थी।
हवा चलती तो कच्चे आमों की महक,
मन के किसी पुराने कमरे का दरवाज़ा खोल देती।
थोड़ी देर बाद,
बाल्टी में हाथ डाला,
एक पीला-सा देसी आम निकाला,
जिस पर पानी की बूँदें,
मोती बनकर ठहरी हुई थीं।
जैसे ही होंठों से लगा कर चूसने लगा,
लगा पूरी गर्मी ने,
एक ही साँस में हार मान ली हो।
रस हथेलियों से होता हुआ,
कोहनियों तक पहुँच गया,
और पास बैठी गिलहरी,
मुझे ऐसे देख रही थी,
जैसे कह रही हो…
"इतना आनंद, अकेले-अकेले भी कोई लेता है क्या?"
तभी पगडंडी से,
छम्म-छम्म पायल की आवाज़ आई।
मैंने आँखें उठाईं,
वह सिर पर घड़ा रखे चली आ रही थी।
मुझे देखकर मुस्कुराई और बोली…
"इतने आम खा लोगे,
तो शाम का खाना कौन खाएगा?"
मैंने हँसते हुए,
एक आम उसकी ओर बढ़ा दिया।
उसने लेने से पहले कहा…
"ठंडा है न?"
मैंने बाल्टी की ओर, इशारा करते हुए कहा…
"हैंडपम्प का ताजा पानी है...
इससे अच्छी, कोई फ्रिज आज तक नहीं बनी।"
उसने आम लिया,
और खटिया के कोने पर बैठ गई,
और उस दोपहरी में,
न जाने कब आम का स्वाद,
बातों की मिठास में बदल गया।
आज शहर की ऊँची इमारतों में,
एयर कंडीशनर तो बहुत हैं,
लेकिन वह लोहे की बाल्टी,
हैंडपम्प का ताजा ठंडा पानी,
देसी आम का रस,
आम के बाग की छाँव,
और दो लोगों की बेफ़िक्र हँसी…
ये सब अब सिर्फ़ यादों के बाग में फलते हैं।
शायद इसलिए बचपन की गर्मियाँ,
मौसम नहीं थीं,
वे जीवन का वह अध्याय थीं,
जिसे जितनी बार पढ़ो,
हर बार होंठों पर आम की मिठास,
और आँखों में गाँव की छाँव उतर आती है।
-रतन कुमार कैथवास
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