तेरे शहर जाने की कश्मकश में, मैं तो अपना शहर भूल बैठा,
ये क्या कर दिया, अब आसमान के चाँद-सितारों से बातें कैसे हों।
भूल आया हूँ वो गलियाँ, जहाँ वो शाम कुछ देर ठहर जाती थी,
अब तेरी चौखट पर खड़ा हूँ, मगर अपनी राहें कबूल कैसे हों।
जिस छत पर बैठकर, मौसम का मिज़ाज पढ़ा करते थे,
उस छत के बिन, अब बारिशों से मुलाक़ातें कैसे हों।
जिस बरगद ने बचपन भर, मेरी ख़ामोशियाँ सुनी थीं,
उससे बिछड़कर, दिल की फिर शिकायतें किससे हों।
तेरे शहर की रौनक ने, मुझको इतना अपने रंग में रंगा,
अब अपने गाँव की मिट्टी से, वही मोहब्बतें कैसे हों।
मैंने तो तेरी एक मुस्कान के बदले, सब कुछ रख छोड़ा,
अब अपने हिस्से की ख़ुशियों पर, हक़दारियाँ कैसे हों।
सफ़र तो पूरा कर लिया, तेरी गली तक आने का मगर,
पीछे छूटे हुए रिश्तों की, अब हिफ़ाज़तें कैसे हों।
ये शहर तेरा भी अजनबी है, मेरा भी नहीं लगता,
दिल के उजड़े हुए मकानों में, फिर आबादियाँ कैसे हों।
अब लौट भी जाऊँ तो, शायद कोई पहचान न पाए मुझको,
वक़्त की इस गर्द में, फिर पहले सी पहचानें कैसे हों।
चलो मान लिया इश्क़ मुकम्मल होने का नाम नहीं,
मगर जो अपना ही आसमान खो बैठे,
उनकी फिर चाँद-सितारों से, रातभर बातें कैसे हों।
-रतन कुमार कैथवास
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