तुम्हारी सुबह क्या मेरी सुबह की तरह ही है?
ऐसे क्यों पूछ रहे हो?
वो भड़क उठी।
"शाम को वहीं मिलो,
तब तुम्हें बताऊँगी।
और हाँ...
ठीक से परीक्षा की तैयारी नहीं कर सकते?
बस आयँ-बायँ चलता रहता है तुम्हारे भेजे में!"
मैंने मुस्कुराकर किताब बंद कर दी।
उसकी डाँट में भी,
एक अजीब-सी फ़िक्र छुपी रहती थी।
जितना वो गुस्सा करती,
उतना ही मुझे यक़ीन होता,
कि मेरी नाकामयाबी से उसे भी फ़र्क़ पड़ता है।
शाम को वही पुराना बरगद था,
वही टूटी हुई बेंच,
वही चाय वाले की भाप उड़ाती केतली।
मैं पहुँचा तो देखा,
वो पहले से बैठी थी,
हाथ में मेरी ही नोटबुक लिए।
मुझे देखते ही बोली…
"सुबह वाला सवाल फिर पूछो।"
मैंने धीरे से कहा…
"तुम्हारी सुबह क्या मेरी सुबह की तरह ही है?"
वो कुछ पल चुप रही,
फिर मुस्कुराई और बोली…
"नहीं...
मेरी सुबह अलार्म से खुलती है,
तुम्हारी सुबह ख़यालों से।
मैं उठते ही किताब खोलती हूँ,
और तुम पहले शेर लिखते हो,
फिर टाइम-टेबल बनाते हो,
फिर खिड़की से आसमान देखने लगते हो।"
मैंने हँसकर कहा…
"तो इसमें बुरा क्या है?"
उसने मेरी नोटबुक वापस देते हुए कहा…
"बुरा कुछ नहीं है,
लेकिन सपनों को भी,
उत्तर-पुस्तिका में लिखना पड़ता है।
इम्तिहान कविता से नहीं,
तैयारी से पास होते हैं।"
उसकी बात मेरे दिल में उतर गई।
उस रात मैंने पहली बार,
किताब के हर पन्ने को,
उसी तल्लीनता से पढ़ा,
जिस तरह मैं, उसकी आँखों को पढ़ा करता था।
इम्तिहान का दिन आया,
पेपर उम्मीद से अच्छा हुआ।
बाहर निकला तो वही मुस्कान,
दरवाज़े पर मेरा इंतज़ार कर रही थी।
वो बोली,
"देखा...
जब दिमाग़ आयँ-बायँ नहीं दौड़ता,
तो मंज़िल सीधे सामने खड़ी मिलती है।"
मैंने हँसकर जवाब दिया…
"और जब कोई डाँटने वाला अपना हो,
तो हर डाँट भी दुआ बन जाती है।"
वो फिर हल्का-सा मुस्कुराई।
शायद उस दिन पहली बार समझ आया…
कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में,
मोहब्बत जताने नहीं आते,
हमें हमारी मंज़िल तक पहुँचाने आते हैं।
-रतन कुमार कैथवास
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