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आसमान भर की बिजलियों पर भी, भारी

                
                                                         
                            उसके आने की ख़बर से ही,
                                                                 
                            
बादलों का घुमड़ना, शुरू हो गया है।
लगता है तेरी तस्वीर में, कोई आतिश छिपी है,
तभी तो हर दिशा में, बिजलियाँ चमकने लगी हैं।
सुबह तक आसमान, बिल्कुल साफ़ था,
पेड़ अपनी ही धुन में, झूम रहे थे,

पर जैसे ही किसी ने कहा…
"वो आने वाली है..."
हवा ने अपनी चाल बदल ली।
पहले बादल आए,
फिर पहाड़ों ने उन्हें बाँहों में भर लिया,
नदियों ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी,
और मिट्टी ने बिना बरसे ही,
सोंधी ख़ुशबू बिखेरनी शुरू कर दी।

मैं मुस्कुराया और बोला…
"अभी तो उसने, दहलीज़ भी नहीं लाँघी,
फिर ये मौसम, इतने बेचैन क्यों है?"
हवा ने कान में धीरे से कहा…
"तुम इंसानों को देर से समझ आता है,
कुदरत अपने मेहमानों को, पहले पहचान लेती है।"

फिर मैंने तेरी तस्वीर को,
हथेलियों में लेकर देखा।
सचमुच...
उसकी आँखों में, एक चमक थी,
जो केवल रोशनी नहीं थी,
वह किसी उम्मीद की आग थी।
ऐसा लगा,
जैसे किसी ने, बादलों के सीने में,
एक चिंगारी रख दी हो,
और वही चिंगारी,
आकाश में, बिजली बनकर दौड़ रही हो।
इतने में पहली बूँद गिरी।


मैंने आसमान की ओर, देखा और कहा…
"क्या अब बारिश होगी?"
बादलों ने जवाब दिया…
"बारिश तो बहाना है,
असल में हम, उसके इस्तक़बाल में आए हैं।"

वह धीरे-धीरे सामने आई।
न उसके हाथ में कोई दीप था,
न आँखों में कोई बनावटी नूर,
फिर भी उसके चेहरे की रौशनी से,
शाम का धुँधलका पीछे हटने लगा।

मैंने हँसकर कहा…
"तुम्हारी तस्वीर में, रंग तो कम हैं,
लगता है, सचमुच कोई आतिश छिपी है?"
वह मुस्कुराई और बोली…
"आतिश तस्वीर में, नहीं होती,
आतिश तो, उन आँखों में होती है,
जो किसी को, पूरे दिल से देखना जानती हैं।"
इतना सुनना था कि,
एक और बिजली, आसमान में चमकी,
और इस बार, मुझे लगा
वह बादलों में नहीं,
मेरे भीतर गिरी है।
तब समझ आया…
कुछ लोग मौसम, बदलकर नहीं आते,
वे आते हैं और मौसम, ख़ुद-ब-ख़ुद बदल जाता है।
उनके आने की ख़बर भर से, बादल घिर आते हैं,
हवाएँ गीत गाने लगती हैं,
और तस्वीर में छिपी, एक मासूम-सी मुस्कान भी,
आसमान भर की बिजलियों पर भी, भारी पड़ जाती है।
-रतन कुमार कैथवास
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2 महीने पहले

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