अपनी शख्सियत ऐसी गढ़ो कि, तुम्हारी मौजूदगी में
बैठा रहना भी लोगों को मुनासिब न लगे।
नाम ऐसा कर जाओ,
कि तुम्हारे ज़िक्र के बिना
कोई महफ़िल पूरी ना हो पाए।
मेहनत की हर ठोकर को,
सीढ़ी की तरह अपनाते रहो।
मंज़िल खुद दस्तक देगी,
बस तुम कदम बढ़ाते रहो।
हुनर ऐसा तराशो कि,
पत्थर भी कोहेनूर बन जाए।
तुम्हारी सोच की रोशनी से,
हर अँधियारा उजाला बन जाए।
वक़्त के साथ चलना सीखो,
पर ज़मीर कहीं बिकने ना पाए।
जीत अगर सिर चढ़ भी जाए,
दिल किसी का झुकने ना पाए।
ऊँचाई ऐसी पाना कि,
बादल भी राह पूछने आएँ।
लेकिन जड़ों की मिट्टी से,
कभी भूलकर दूर न जाएँ।
सफ़र तुम्हारा ऐसा हो कि,
रास्ते मिसाल बनाते जाएँ।
हार भी तुमसे मिलकर,
जीत का मतलब समझाते जाएँ।
काबिलियत का शोर नहीं,
उसका असर दिखाई देता है।
सूरज कभी अपना परिचय नहीं देता,
बस हर सवेरा उसकी गवाही देता है।
-रतन कुमार कैथवास
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