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अपना सूरज तलाश लूँगा खुद

                
                                                         
                            जो रात भर भी अकेला जला है राहों में,
                                                                 
                            
उसी के दम से सहर की नई निशानी है।

हवा ने लाख कहा… बुझ जा, रास्ता छोड़ दे,
चराग़ ने भी कहा… मेरी ज़िद पुरानी है।

जो ख़ुद को वक़्त के हाथों सुपुर्द कर बैठे,
उन्हें कहाँ ये ख़बर, मौत भी रवानी है।

मैं अपने हिस्से का सूरज तलाश लूँगा ख़ुद,
मुझे किसी की इनायत कहाँ सुहाती है।

जो पत्थरों से भी टकराकर मुस्कुराता रहे,
उसी के नाम ये दुनिया की कामयाबी है।

हमारे ख़्वाब को कमतर न आँक ऐ दुनिया,
ये राख में भी दबी आग की निशानी है।

अभी तो रात है, तूफ़ान है, सन्नाटा है,
सुबह भी आएगी… इतनी तो बात मानी है।
-रतन कुमार कैथवास
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8 घंटे पहले

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