बाज़ार हमेशा की तरह सजा हुआ था।
दुकानों पर रोशनी थी,
लोग मोल-भाव कर रहे थे,
कहीं हँसी बिक रही थी,
कहीं रिश्तों पर छूट लगी थी,
कहीं वफ़ादारी की कीमत तय हो रही थी।
मैं भी उसी भीड़ से होकर गुज़रा,
मगर न जाने क्यों,
हर चेहरा मुझे आईने की तरह लगे…
सब अपने-अपने किरदार में थे,
पर अपने-अपने सच से दूर।
एक दुकानदार ने आवाज़ लगाई…
"जनाब! क्या चाहिए आपको?"
मैंने कहा…
"अगर हो सके तो,
थोड़ी-सी सच्चाई तौल दीजिए,
दो मुट्ठी अपनापन दे दीजिए,
और अगर बची हो,
तो थोड़ा-सा भरोसा भी रख दीजिए।"
वह हँस पड़ा।
बोला…
"साहब, ये सामान अब, इस बाज़ार में नहीं मिलता।"
मैं चुप हो गया।
शायद उसी पल,
सीने की जलन और तेज़ हो गई।
आँखों में जो तूफ़ान था,
वह किसी इंसान के ख़िलाफ़ नहीं,
उस दौर के ख़िलाफ़ था,
जहाँ चेहरे पहचान बन गए,
और चरित्र, परिचय देना भूल गया।
चलते-चलते,
एक बूढ़ा फ़कीर मिला।
उसने बिना पूछे कहा…
"बेटा, भीड़ में खो जाना आसान है,
भीड़ से ख़ुद को बचाए रखना मुश्किल।"
मैंने पूछा…
"फिर ये बेचैनी कब ख़त्म होगी?"
वह मुस्कुराया और बोला…
"जिस दिन तू बाज़ार में,
लोगों की जेब नहीं,
उनके दिल पढ़ने लगेगा,
उस दिन ये तूफ़ान भी,
बारिश बन जाएगा।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
भीड़ अब भी वैसी ही थी,
रोशनियाँ अब भी चमक रही थीं,
मगर मुझे समझ आ गया था…
हर भरा हुआ बाज़ार, आबाद नहीं होता,
और हर अकेला इंसान, तन्हा नहीं होता।
सीने की जलन,
सिर्फ़ दर्द की निशानी नहीं होती,
कई बार वह, ज़मीर की आग होती है।
आँखों का तूफ़ान,
सिर्फ़ आँसुओं से नहीं उठता,
कभी-कभी दबे हुए, सवालों से भी उठता है,
जब होंठ ख़ामोश हों और ज़मीर चीखता है,
जब सच सामने हो, मगर कहने की इजाज़त न हो,
तब आँखों में पूरा समंदर उमड़ता है।
-रतन कुमार कैथवास
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