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आईना तो ना कहो

                
                                                         
                            हर चमकते हुए चेहरे को आईना तो ना कहो,
                                                                 
                            
कुछ चेहरे अपने मतलब के किरदार भी होते हैं।

हर झुकी हुई नज़र को इबादत तो ना कहो,
कुछ पलकों के पीछे कई तीर भी होते हैं।

हर मीठी बात को अपनापन तो ना कहो,
कुछ लफ़्ज़ ज़हर से भी ज़्यादा असरदार भी होते हैं।

हर मुस्कुराते हुए होंठों को बेफ़िक्र तो ना कहो,
कुछ हँसी के पीछे सदियों के इंतज़ार भी होते हैं।

हर ऊँचे हुए कद को शिखर तो ना कहो,
कुछ पेड़ आँधियों में अंदर से बीमार भी होते हैं।

हर जीतने वाले शख़्स को सिकंदर तो ना कहो,
कुछ फ़तहें अपने ही ज़मीर की हार भी होते हैं।

हर खामोशी को कमज़ोरी तो ना कहो,
कुछ सन्नाटे आने वाले हुंकार भी होते हैं।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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