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अधूरे रहकर भी रूह में बसते हैं

                
                                                         
                            आपकी आँखों में जितना समंदर था,
                                                                 
                            
मुझे उससे कुछ कम दिखा,
इनायत कैसे करूँ,
जब सुर तुम्हारे या मेरे थे ही नहीं,
बस वक़्त की ख़ामोशी का एक सिलसिला था।
लब तो बहुत कुछ कहना चाहते थे,
मगर अल्फ़ाज़ रास्ता भूल गए,
जो धुन हम दोनों गुनगुनाना चाहते थे,
उसके साज़ ही कहीं दूर छूट गए।
बिन राग के महफ़िल कैसे सजती,
बिन सुर के गीत कहाँ लिखा?
तुमने नज़रें झुकाकर जो कहा,
वो शायद हवा ने सुन लिया,
मैंने मुस्कुराकर जो छिपाया,
उसे आईने ने चुन लिया।
दास्ताँ अधूरी रह गई,
किसने किससे क्या कहा?
तुम चाँद की मानिंद ठहरे रहे,
मैं बादलों में उलझता रहा,
फ़ासलों की धूप इतनी थी,
कि साया भी पिघलता रहा।
जब मौसम ही साथ न आया,
तो दोष किसे देता भला?
शिकायत भी कैसी करें,
गुनाहगार कोई था ही नहीं,
तुम अपनी ख़ामोशियों में सच्चे थे,
मैं अपने सब्र में झूठा नहीं।
बस मुक़द्दर की उँगलियों ने
हमारा नाम साथ न लिखा।
अब अगर कभी मिलो,
तो हिसाब-किताब की बात न करना,
जो नहीं मिला,
उसे तक़दीर की तह में ही रहने देना।
कुछ रिश्ते मुकम्मल होकर नहीं,
अधूरे रहकर भी रूह में बसते हैं।
और हाँ…
अगर कभी फिर,
तुम्हारी आँखों में झाँकूँ,
तो इस बार,
समंदर न ढूँढ़ूँगा,
बस इतना देखूँगा…
क्या मेरी याद का,
एक छोटा-सा किनारा,
अब भी वहाँ बचा है या नहीं।
-रतन कुमार कैथवास
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3 महीने पहले

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