गणपति वंदना सी हो गई है भ्रष्टाचार की क्रिया,
पहले चढ़े चढ़ावा फिर हो शुरु कोई प्रक्रिया,
परंपरा अनुरुप प्रथमतः घूस का भोग चढ़ायें,
बिना चढ़ावे सरकारी दफ्तर न बिल्कुल जायें,
बिना घूस डोलता ही न तंत्र का निष्ठुर हिया,
गणपति वंदना सी हो गई है भ्रष्टाचार की क्रिया।
खाली हाथ जो हैं प्रभु सुनते हैं उनकी भी दुआ,
किंतु तंत्र में तो चलता है बस पैसा और पउआ,
अपने सरकारी साहब देवों से भी हैं दुर्लभ,
पैसे और पउआ वालों को सर्व सेवा है सुलभ,
लोक व्यवस्था का इन्होंने चीरहरण कर लिया,
गणपति वंदना सी हो गई है भ्रष्टाचार की क्रिया।
जनहित को समझ सोमरस पी जाते हैं गटगट,
बिना चढ़ावे सरकारी देवता न होते प्रकट,
जनहित की आहूति इनको सबसे ज्यादा प्यारी,
देवी लोकतंत्र की इनके चरणों में बलिहारी,
जनता के हाथों में है बस मजबूरी का दिया,
गणपति वंदना सी हो गई है भ्रष्टाचार की क्रिया।
-रश्मि सिंह
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