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स्वीकार है आवारा है

                
                                                         
                            कुछ सदमों को स्वीकारा है
                                                                 
                            
जिंदगी को कुछ इस तरह संवारा है
इंतहा हो या इम्तिहा हों
सबको हमने नक्कारा है
आवाज देते हैं जब आसमान
बारिश बूंदे चिल्लाती है
बंद कमरों से हमारी लगी लगन
हमने कभी किसी को भी पुकारा है
रहते है हम खोए खोए
राह में कांटों को पिरोए
हमने अपनी ख्वाहिशों को ललकारा है
क्या हम, क्या दुनियादारी
सबकी दस्तक को दुत्कारा है
हां हमनी मौन को स्वीकार किया
ठंडी रातों से प्यार किया
आवाज किसी को दिया नहीं
बस कल की याद ने मारा है
हां मैं खुल कह सकती हूं
"हां", मेरा दिल आज भी आवारा है
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एक वर्ष पहले

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