टुकड़े टुकड़े कर कर कर अपना टुकड़ा खो दिया
जब रात अकेली आंख झपे न
आँखें में आंसू भरकर कर रो दिया
देखने गए चांद तलक हम
कहीं कोई फल हमें दिखे न
कौन जाने इस फलाहारी में कब अपना बंजर बो दिया
आवाज उठी कि उठ जाऊं
भौंरा भी अब तो खो गया
सब बना रहे है इतना सब कुछ तो
सबने उसमें ही सब कुछ खो दिया
तिनका तिनका करते करते अपना टुकड़ा खो दिया
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