पत्ता पत्ता अब बिखरेगा
हर किसी की कहानी कौन लिखेगा
जन जन तो अब टूट रहे है
कौन संभला हमें दिखेगा
कोई दुरुस्त अपनी दीवारों से
कौन नदियों तालाब भरेगा
सबको चिंता है बस अपनी अपनी
कौन बस्ती में अब बसेगा
तेरी मेरी तो सब कर लेते है
हमारी सबकी कौन कहेगा
पत्ता पत्ता सब बिखरेगा
अपने अपने के चक्कर में
सबका अपना भी पिछड़ेगा
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