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शिकायतें

                
                                                         
                            जब अपने ही अपने न रहे
                                                                 
                            
फिर गैरों से शिकायतें क्या करें
नक्कारा तो हमें दूनिया कहती है
अपनों ने भी कहा फिर रहम करें,

वक्त आये बहुत मिटी हजारों कस्तियां
तिनका बचा था वो भी उठा ले गयीं हस्तियां।
जब अमीरों ने ही घर जलाया
गरीबों से क्या तमाशे की शिकवा करें ।
जब अपने ही अपने न रहे
फिर गैरों से शिकायतें क्या करें

देखो जरा मंजर तो ये
दिल ही दिल से गिला करे
फिर जिस्म तो एक मिट्टी ही है
उससे क्या हम ख्वाहिश करें
जब अपने ही अपने न रहे
फिर गैरों से शिकायतें क्या करें।

आये होगें हम भी वक्त का फरिस्ता बन कर
ठोकरें मिली बहुत तो किस्मत क्या करे
इंसान ही है फिर से चलेंगे।
ठोकरें मिली तो खूदा क्या करे ।
जब अपने ही अपने न रहे
फिर गैरों से शिकायतें क्या करें
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2 वर्ष पहले

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