जब हाथ तुम्हारे रुक जाएँ,
कतली के धागे चुक जाएँ।
जीवन के ताने-बाने में,
संभावनाएँ सभी सिमट जाएँ।
जब करघे की धम-धम धुन भी
सन्नाटों में खो जाए,
मेहनत का रंगी आँचल भी,
बाज़ारों में फीका पड़ जाए।
जब सपनों की चादर बुनकर भी
रोता रहता हो बुनकर ही,
जब श्रम-सिंचे हर धागे का भी
संसार हाय! न मोल करे।
तब प्रभु के करुणा-करघे पर
भक्ति का कोमल तार धर।
जो बुनता है हर जीवन में
आशा का अनुपम विस्तार।
जिसने नभ में टाँके तारे,
धरती को दिए श्रृंगार सारे,
वही तुम्हारे सूने करघे को
फिर सृजन का उपहार करे।
फिर तुम नित नवीन बनकर
रचना ऐसी कर देना,
जिसमें बसता स्वयं ईश्वर हो,
वह दुशाला जग को दे देना।
जिसकी हर इक बुनावट में
करुणा, प्रेम और विश्वास रहे,
जिसे ओढ़ मनुष्य ही नहीं,
मानवता का भी मान रहे।
निराशा के इस संसार में
आशा के धागे बन जाना,
अपने श्रम को पूजा करके
ईश्वर का स्पर्श बना जाना।
जब तक इस धरती पर मानव है,
तब तक तेरा सम्मान रहे।
हर करघा मंदिर बन जाए,
हर बुनकर पर
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