अपने बस में कुछ नहीं
मान लिया उसकी मर्ज़ी यही
उसने कुछ और थी लिखी
औरों ने कुछ और थी माँगी
अपने अंदर हज़ारों
छुपी घुटी अनकही
कोशिकाओं में दबी
सुबकती सिसकतीं पड़ीं
यह इच्छाओं की बरसातें
क्या कभी कहीं ख़त्म हुई
ना तेरी सारी ना मेरी सारी
अधूरी यहाँ वहाँ बिखरी पड़ीं
गर पूरी हो जाएँ सारी
बैठे निठल्ले हो जाएँगे हर घड़ी
सौ फीसदी कब किसकी चली
आधी तिहाई चौथाई की मुठभेड़ रही
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