आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

परवान-ए- इश्क़

                
                                                         
                            इश्क़ जब परवान होता है,
                                                                 
                            
हर शख़्स मुखबिर ज़माने का लगे।
जी चाहे कि कोई दूसरा पास न हो,
धड़कनों की सदा भी पराई लगे।
यह ख़ास, सबका प्यारा एहसास,
जज़बातों के परों पर उड़ानें भरे।
न पहरे हों, न कोई बुरी नज़र हो,
इस ख़ूबसूरत सफ़र पर बस साथ चलें।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर