हमें सब याद है तुम्हारा मुड़-मुड़ के देखना,
वो हल्के से ज़ुल्फ़ों पर हाथ फिराना।
फिर धीरे से आगे बढ़कर पीछे-पीछे चले आना,
हमें हमीं से चुपके-से नज़रों में चुरा ले जाना।
मानो कुछ हुआ ही न हो,
यूँ मासूमियत से जतलाना,
महफ़िल में सौ गज़ की दूरी का नाटक दिखाना।
ना हिसाब, ना किताब—ना कोई इज़हार
बस ज़हीन किरदार से सुकून-ए-ज़िंदगी के पन्ने लिखते जाना।
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