खुशी मिली थी मुझे इक बार,
कोने में अकेली, रुआँसी-सी।
मैं भी थी कुछ अलसायी-सी,
वो भी दिल से भरी, भारी-सी।
दोनों का सामना हुआ,
दिल हल्का करने का दिल हुआ।
वो बोली—लोग मुझसे दोस्ती नहीं निभाते,
मेरे अथक प्रयत्न भी दुत्कारे जाते।
तमाम सहूलियतों के बावजूद
ख़ुद को असहाय बताते,
शिकन बढ़ती जाती उनकी,
होंठों पर मुस्कान तक नहीं लाते।
चाहकर भी कुछ न कर पाती,
थके-हारे लोग देख,
घुटती जाती उदासी।
कहाँ जाए, कहाँ डेरा जमाए,
हर जगह मन न लगा पाए।
व्यथित हुई मैं,
सुप्त चेतना अपनी जागी—
नादान हम इंसान,
इसलिए तो खुशी हमसे दूर भागी।
खुली हवा, हमारी इंद्रियाँ सलामत,
फिर भी मायूसी का डंका बजाते।
इफ़रात में मिली नियामतों को
नगण्य किए जाते,
और-और की लोलुपता में
मरते-मराते जाते।
कुछ बदलाव का ख़ुद से वादा किया,
उसकी ख़ुशबू के लिए
दिल को खोल दिया।
अब शिकायतों का बस्ता
दूर फेंक दिया,
जो है, उसमें हँसकर
जीना सीख लिया।
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