अब छोड़ भी दो हमें याद करना,
हिचकियाँ लेते-लेते रातें सो नहीं पातीं।
नींद भी रूठी है, ख़यालों में तुम्हारा पहरा,
ख़ामोशियाँ फिर भी यादों के रंग सजाती हैं।
चाँद में भी तुम्हारा ही अक्स ठहर जाता है
गिनती तारों की अब हमसे हो नहीं पाती।
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