दस्तक तो ज़रूर होती होगी
तुम्हारे दिल पर हमारी शरारत की।
लेके दबी आहट दहलीज़ तक आते भी हो,
फिर अपना हसीं साया क्यों बचाते हो।
चाहते भी हो तुम इश्क़ का दीदार,
फिर नज़रें क्यों हमसे चुराते हो।
बड़े नासमझ हो, दिल चुराकर
बेवफ़ाई का इल्ज़ाम लगाते हो।
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