आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हम और आप कब तक ..

                
                                                         
                            करते करते ख़ुशियों का इंतज़ार
                                                                 
                            
निकल रहे सोमवार से रविवार

छुपी जहां , बाहर ले आयें
मुस्कुरा और हंस लिया जाये ।

दिन , माह , बरस गुजर जाएँगें
हम और आप कब तक नज़र आयेंगे

धुंधली सी छवि रह जाएगी
फोटो पर माला टंग जाएगी ।

यही शाश्वत चला आया नियम
जियो आज छोड़ फिर जीने के भ्रम

क्यों दबी ज़ुबान जब सत्य पथ पर
बढ़ रहे कदम ख़ुद उठ उठ कर ।

ना तुम असहाय ना बेसहारा
दे रहा भरपूर वो इक देने वाला

शुक्र उसका जो साँसे दिये जा रहा
गुस्ताखियों को माफ़ किए जा रहा ।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर