करते करते ख़ुशियों का इंतज़ार
निकल रहे सोमवार से रविवार
छुपी जहां , बाहर ले आयें
मुस्कुरा और हंस लिया जाये ।
दिन , माह , बरस गुजर जाएँगें
हम और आप कब तक नज़र आयेंगे
धुंधली सी छवि रह जाएगी
फोटो पर माला टंग जाएगी ।
यही शाश्वत चला आया नियम
जियो आज छोड़ फिर जीने के भ्रम
क्यों दबी ज़ुबान जब सत्य पथ पर
बढ़ रहे कदम ख़ुद उठ उठ कर ।
ना तुम असहाय ना बेसहारा
दे रहा भरपूर वो इक देने वाला
शुक्र उसका जो साँसे दिये जा रहा
गुस्ताखियों को माफ़ किए जा रहा ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X