तुम इंकार की हुंकार भरते हो,
इज़हार चेहरे से हम पढ़ते हैं।
हर्फ़ों की किताबें क्या पढ़नी,
अनपढ़ ही सही, पर अच्छे हैं।
जब दिल लगाकर कुछ न सीखा,
ज़िंदगी के पन्ने उलटते-पलटते हैं।
दुनिया के लिए बिरले ही पन्ने खुले हैं,
तुम पर शायरी के सफ़्हे जुड़ते चलते हैं।
न तुमसे शिकायत, न दुनिया से,
हर हाल में नाम लेकर जी लेते हैं।
ख़ुदा का लिखा दोनों का मुक़द्दर,
हाशिए मिलेंगे ज़रूर, दुआ में हाथ उठते हैं।
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